नन्ना की चप्पल

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नन्ना की चप्पल

आज भोर से ही मेरी चप्पल गुम है, पता नहीं कहाँ चली गई कब से ढूंढ रही हूँ मिलने का नाम ही नहीं ले रही है| दिन तक तो ठीक था, वह अधिक प्रयोग में नहीं आती परन्तु साँझ होते ही मुझे उसकी बहुत आवश्यकता पड़ती है| साँझ होते ही एक आदत पुरानी है मेरी, उस समय बाहर बागीचे में रहना अधिक भाता है मुझे, इस कारण वश मैं इस खोज में लगी थी|

काफ़ी देर तक खोजने के पश्चात, मेरी नज़र आँगन के तुलसी घरुआ पर पड़ी, वह घरुआ जो एक पक्के मकान को पुरानी संस्कृति से जोड़ता है| वह नन्हा श्यामा तुलसी का पौधा अपनी महक और गुणों के साथ, अपनी गाँव की माटी की याद दिलाता है| उसके सीध में एक चप्पल रखी थी, ठीक उसी प्रकार जैसे मंदिर के बाहर भक्तों की चप्पलों के लम्बी कतारें लगी रहती हैं| आकार में सामान्य पुरुष की चप्पल से तनिक बड़ी थी, नीले तथा हरे रंग की चप्पल, अब तनिक पुरानी हो गई थी, रंग फिका हो चला है, प्रतीत होता है अब इस्तमाल भी नहीं आती होगी| ना जाने कितनी चप्पलें आई और गई होगीं परन्तु लगाव मुझे सिर्फ इन्ही से हुआ|

उन चप्पलों को देख कर मेरे चहरे पे एक सुनहरी सी मुस्कान आ गई, और आहिस्ता- आहिस्ता वह मुस्कान एक खिल-खिलाती हँसी बन गई| मेरी बचपन की यादों में बसने वाली वह छोटी प्यारी सी पाँच वर्षीय बालिका मैं नें एक इक्कीस वर्षीय युवती से प्रश्न किया, “क्या तुम्हें याद हैं यह चप्पल?” मेरी इस खिल-खिलाती हँसी नें जैसे हामी भर दी| मैंने मद्धम आवाज़ में स्वयं को उत्तर दिया, “हाँ मुझे याद हैं यह चप्पल”|

यह उन दिनों की बात है जब हम इस शहर में नए आये थे और जब मेरा दाखिल कक्षा एक में सुनिश्चित किया गया था| नए शहर में कोई दोस्त नहीं बना था मेरा, और इक्षा तो थी कि पूरा मोहल्ला मेरा दोस्त बन जाए परन्तु पहल करना नहीं आता था मुझे, परन्तु हाँ पूरा गाँव मेरा दोस्त था| उन दिनों की बात है मैं जब माटी से खेला करती थी, कभी पत्तों से गौरिया के लिए उनके घरौंदा बनाती थी, कभी नन्हें मासूम पिल्लों के साथ खेलती| कोई सपना नहीं था सिर्फ दिनचर्या अच्छी लगती थी, परन्तु जिस दिन नन्ना की उन चप्पलों नें मेरे जीवन में प्रवेश किया उस दिन से सब बदल गया था|

इन चप्पलों से मेरा गहरा नाता है, यह नन्ना की चप्पल हैं| जब वह इन्हें खरीद कर लाये थे तो मुझे इनसे लगाव नहीं था, परन्तु जब से पापा नें इन्हें पहना यह मुझे भानें लगीं| आज भी मन हुआ एक बार इन चप्पलों को पहन कर देखूँ, कदाचित अब यह मेरे पाँव के नाप की होगीं| आज भी यह चप्पल मेरे लिए वही महत्व रखती हैं जो उन दिनों रखा करती थी| मुझे माँ के आभूषणों से अधिक प्रिय थी, नन्ना की चप्पल|

एक रोज़ वह चप्पल वहीं रखी थी, जहाँ वह आज सुशोभित थी| मैं उन दिनों अपने घर के प्रत्येक कमरे में मात्र एक मौका तलाशती थी उन चप्पलों को अपने पाँव में सजा देखने का| प्रकृति को मुझ मासूम बालिका पे तरस आ गया और उसने मुझे वह अवसर प्रदान किया| एक पहर जब सभी अपने कार्यों में लीन थे, सबकी निगाहों से बचते हुए मैं उस खज़ाने के पास गई, आखिरकार वह खज़ाना इतने दिन पश्चात मुझे मिल ही गया था| मैं उन्हें अपने हाथों से उठाकर छत पर ले जाने लगी, पाँव में पहन लेने पर आवाज़ होती और कोई ना कोई आँगन में आ जाता, कदाचित इसलिए मुझे उन्हें छत पर ले जाना उचित लगा|

बहुत समय लगा मुझे इन चप्पलों को हाथ में उठाने का साहस करने में क्योंकि प्रत्येक गाँव वासियों के लिए यह पाप था, अब आप सोचेंगे चप्पल उठाने में पाप कैसा? मैंने अपने पिता की चप्पलों को स्पर्श किया था| बुंदेलखंड में प्रत्येक कुँवारी मौड़ी को आदिशक्ति भवानी का रूप माना जाता है| इसलिए प्रत्येक कन्या का अपने माता-पिता के पाँव छूना वर्जित है, तथा वह अपने माता-पिता के पाँव स्पर्श कर के वह सौभाग्य और आत्माशान्ति प्राप्त नहीं कर सकती|

जो पाप मैंने उत्सुकता वश किया था, वह एक नई उड़ान भरने वाला था| उस तपती धूप में मैं सूरज चाचा को ब्रह्माण्ड की सबसे उत्तम वस्तु दिखलाना चाहती थी, यह चप्पल|

कठिन परिश्र्म करते समय यह मेरे नन्ना के पाँव को काँटों से, कंकड से, तपती भूमि से, कीचड़ से उनकी रक्षा करती थी तथा हम सभी को चलते रहने और आगे बड़ते रहने की प्रेरणा देती थी| कदाचित इसलिए वह मेरे लिए इतनी प्रिय थी|

मैंने नन्ना की चप्पलों को अपने पाँव में धारण किया और थप-थप करके आगे बढ़ने लगी| वह मेरे पाँव से चार से पाँच गुना बड़ी रही होगीं, उन्हें पहनकर मुझे जो आनंद आया वह आज भी मुझे हर्षित कर जाता है| उन्हें पहन कर चलने पर मुझे यह लगता था कि मैं पूरी दुनियाँ नाप लूँगी, मैं आकाश की उचाईयों को छू सकती हूँ| वह पाँच वर्षीय बालिका अब आकाश छूना चाहती थी, प्रथम बार मैंने खुली आँखों से एक स्वप्न देखा था| वो कोई साधारण चप्पल हो नहीं सकती, जिन्हें पहन कर आपने अपना प्रथम स्वप्न देखा हो |

लेखिका "संस्कृति सिंह " ने हिंदी साहित्य में रचनाओं के लिए इन्होने “निरंजन” शब्द का सहारा लिया है| इन्होने अपनी कहानियों में जहाँ अंधविश्वास, रूढ़ियों तथा अन्धपरम्परायो पर चोट की है, वही सहज मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों की रक्षा की है|  इस प्रकार संस्कृति सिंह निरंजन अपनी कहानियों द्वारा भारतीय जन जीवन की यथार्थ झांकी प्रस्तुत करती है, तथा समाज के विभिन्न वर्गो की ज्वलंत समस्याओं का प्रगतिशील दृष्टिकोण भी पाठको के समक्ष रखती है| 
Sanskriti Sing Niranjan
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