एक नयी सोच

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एक नयी सोच

िम्मत छूटी है मंज़िल नहीं,
रास्ते कठिन है पर नामुमकिन नहीं,
किस्मत हारी है,
मजबूरी नहीं |

ग़म कुछ इस तरह बढ़ गए,
की इंसान खामोश और दिमाग हल्ला बोल पर है |
दीवारें शांत है,
पर उम्मीदे नहीं |

क्यों आकांक्षाएँ जीने नहीं देती?
क्यों जरूरतें उड़ने नहीं देती?
“आजाद” एक ऐसा शब्द है जो हकीकत में शायद है ही नहीं |

जिंदगी अपने हिसाब से जियो,
अभीं भी एक उम्मीद है |
आज आखों मे नमी है, जुबान पर हिचकिचाहट है,
दिल में गुस्सा दिमाग में अशांति का मंजर है |

ख़ैर वक़्त वक़्त की बात है,
ये वक़्त भी शायद बदल जाए,
या बदल दे इंसान को,
ना जाने क्या है सच्चाई |

बस कोशिश ये है कि ख्वाहिशें बोझ ना बन जाए,
और जिंदगी बंजर ज़मी |

Ishita
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